छतरी, हेलमेट और बरसाती कमाल का आनंद देते हैं.......!












मदन वर्मा " माणिक " इंदौर, मध्यप्रदेश 

इंदौर ( स्वतंत्र प्रयाग) कहीं बरसात बहुत अच्छी, कहीं अपर्याप्त हो रही और सावन के सेरे भी पड़े, कहीं एक दिन में कई इंच पानी गिरा तो कहीं बादल फटे व मूसलाधार तो कई जगह झमाझम का इंतजार हो रहा। लेकिन कुछ इलाकों को छोड़कर सभी जगह अमूमन वर्षा हो रही है। इसी के साथ तीज-त्योहार भी शुरू हो गये और पहले हेलमेट लगाकर कर्जा देने वालों से बचकर निकल जाते थे लोग

अब बरसाती (रेनकोट) पहनकर बच जाते हैं, कुछ छाते में मुंह छुपाकर जल्दी से सामने से निकल जाते हैं। किसी से बात नहीं करनी हो तो और भी अच्छा है। जहां वर्षा सही ढंग से बराबर नहीं हो रही। वहां छतरी, बरसाती की पूछ-परख हल्की होने से

बड़ी कोफ्त है। कोस रहे हैं। भाव-ताव बहुत करने लगे हैं लोग। मुंह मांगें दाम नहीं मिल रहे हैं। हेलमेट अनिवार्य होने से, इलेक्ट्रॉनिक व डिजिटल केमरे से चालान नहीं बन जाये, बाकायदा सिर पर हेलमेट धारण करने वालों में होड़ मची है।

इसमें भी डबल फायदा वर्षा में सिर भी गीला ना हो, देनदार और सूदखोरों को सूद भी ना लगे की सामने उसका देनदार जा रहा है और वे नकाबरूपी वेष धारण कर झट से वाहन आगे बढ़ाकर

निकल जाये। जब सड़कों पर अतिवृष्टि से पानी ही पानी हो तो छाता अड़ाकर अपने को गीला होने से बचा सकते हैं। जब गलियों से गुजरते तो आवारा कुत्तों को भगाने के काम आ जाता हैं छाता। जब कोई लुटेरा पर्स - चेन, नगदी छीन झपट ले तो टांगों या कंधे पर अड़ाकर ऐसे अड़ी बाजों को आसानी से धराशाई किया जा सकता है। हेलमेट से खोपड़ी फूटने से बच जाती है। मकान मालिक, सूदखोर बिना देखे निकल जाता है इसलिए आधुनिक दौर में छतरी, हेलमेट और बरसाती सब काम आ रहे हैं। हेलमेट तो आईएसआई मार्का ले लोगे। छाता और बरसाती भी टनाटन मजबूत, सुपर क्वालिटी की लोगे। एक दौर था। छातों में मजबूत टाफेटा ब्लेक कपड़ा डाला जाता था। उस दौर में टैंक छाप छाता मजबूत आता था। छाता 12-16 ताड़ी का मजबूत आता था। लोहे की मूठ, डंडी वाला, फ्लावर्स की डिजाइन वाली डंडी वाला आता था। एक छाते में दो-तीन लोग पानी से बचाव कर लेते थे।

पुराने समय में छाता वजनदार और भारी होता था। ऐसे छाते से साईकिल चलाकर काम पर भी जाते थे लोग और बरसात के मौसम में गलियों व बाजारों में आवाज लगाकर छाते सुधारने वाले घूमते नजर आते थे। मंदिरों, दुकानों व कार्यक्रमों में छाते अक्सर बदला जाते थे, जूते-चप्पलों की तरह। बच्चों के लिए 

छोटे रंगीन छाते मिल जाते थे। फिर लेडिज व जेंट्स छाते भीमिलने लगे। आजकल छाते सैंकड़ों डिजाइन व क्वालिटी में मिलने लगे हैं। वजन में हल्के वनफोल्ड, टूफोल्ड, थ्री फोल्ड ऐसे की रखना-अबेरना, उठाना-रखना आसान रहे। सुंदर भी दिखें। पुराना समय याद आता हैं जब छाता खोलने-बंद करने में उंगली आ जाती थी।

बरसाती की पूछों मत, प्लास्टिक होता या टाट की बोरी मजदूर और मजबूर, ठेले वाले उसे ही ओढ़ कर बरसात में अपना पानी से बचाव कर लेते थे। टेलीफोन बिजली व कई महकमों में रबर की काली व खाकी की मजबूत बरसाती दी जाती थी, ये मार्केट में भी मिलती थी। सबसे मजबूत डकबेग की बरसाती आती थी। जो पानी में बहुत भारी हो जाती थी। लोग इसको पहनकर पसीने से भींग जाते थे, ये तकरीबन पांच से भी अधिक वर्षों तक काम चला देती थी। अब जैसे छातों की वेरायटी बदली वैसे ही बरसाती में भी कई किस्में ईजाद हुई। अब अनेक किस्मों की अलग-अलग तरह के मजबूत रबर, प्लास्टिक व अन्य मिश्रित आइटमों से निर्मित बरसाती इंग्लिश में रेनकोट सस्ते से ऊंचे, महंगे सब बाजारों में लांग-मीडियम-ऐक्सेल-डबल एक्सेल लेडिज, जेंट्स व बच्चों की साईज में लांग गाऊन-कोट, पेंट-शर्ट रूप में अनेकों रंग रुप में टोपी के साथ मार्केट में उपलब्ध रहती हैं। तो समझ लो भैये धोती लोटा चौपाटी की तर्ज पर छतरी, हेलमेट और बरसाती इस बरसाती मौसम में आज भी बड़े कमाल का आनंद देते हैं।



                          


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