सोमवार, 7 जून 2021

आधुनिकता की चकाचौंध में सब कुछ बदल गया है , शादी विवाह के पुराने रीति रिवाज

 

 बदला नही तो वही गाने बाली मांगलिक गीत,शगुना लिहे राम आवत होइही ?

जसरा/ प्रयागराज(स्वतंत्र प्रयाग): आधुनिकता की चकाचौंध में सब कुछ बदलता जा रहा है धीरे धीरे शादी विवाह के रीति रिवाज यहां तक कि खाना पीना रहन शाहन पहनावा सब कुछ बदल गया है अब नही बदला है तो वही शादी में गाए जाने वाली मांगलिक गीत ,,शागुन लिहे राम आवत होइहीं,, वैसे यह मांगलिक गीत भी आधुनिक हो गयी है।

शादी विवाह में लगभग चार दशक के पहले तक जब घर मे शादी तय हो जाती थी उसके लगभग दस दिन पहले से गांव मुहल्ले की औरते एकत्र हो कर मांगलिक गीत गाया करती थी लगता था कि इस गांव में शादी है पंद्रह दिन पहले से खाने के लिए बारातियो तथा घरातियों के लिए इन्तिजाम किया जाता था अब तो बाजार से सीधे आटा चाउमीन चाट फुल्की आइसक्रीम का बयान दिया जाने लगा है हलवाई का इन्तिजाम किया जाता है पहले गांव में रोशनी के लिए गैस का इन्तिजाम होता था ज्यादातर गांव में लोग चंदा करके सागर हन्दा आदि रखते थे जिसके यहां गांव में शादी विवाह होता था उसी का प्रयोग होता था अब पहले तो गेस्ट हाउस शादी घर नही अगर घर से शादी होती है तो टेंट हाउस से सीधे इन्तिजाम रहता है बिना स्टेज जयमल और बैंड बाजा दी जे के शादी में दूल्हा जाने के लिए ही नही तैयार होता पहले शादी में डोली पालकी होती थी जिसका पहले से इन्तिजाम किया जाता था ज्यादा कर बस नही रहती थी खाली इक्का तांगा बैलगाड़ी से बारात जाती थी एक दिन बारात वहां रुकती थी तीसरे दिन बिदाई होती थी अब लग्जरी गाड़ियां बफर ब्यवस्था सब आधुनिकता की दौर में पूरे सिस्टम को ही बदल दिया है पहले एक महीन पतले मारकीन का शादी का पहनावा होता था जिसको जामा जोरा बोला जाता था मौर होता था जिसमे चमकदार घुघरू बल्ब की तरह लगे होते थे जिसे माली देता था या बाजार से खरीद जाता था अब तो उसका रूप शेरवानी तथा साफा ले लिया है पहले पुराने रीति रिवाज से शादी की बात ही कुछ और थी अब तो आधुनिकता की चका चौंध में सब कुछ बदल गया है बदला नही है तो वही मांगलिक गीत "शगुन लिहे राम आवत होइहि"!

   दरवाजे पर बारात की अगवानी के लिए गाँव के तमाम लोग एकत्रित रहते थे, द्वारचार में पंडितों के मंत्र उच्चारण करने से वातावरण गूँज उठता था, दूल्हा सहित सभी बाराती जमीन पर पल्थी मारकर भोजन के लिए बैठते थे, लड़की का बाप दूल्हे को एवं अन्य बारातियों को भी सामर्थ्य के अनुसार रुपये देते थे, फिर चढ़ाव के कार्यक्रम में दूल्हे के बाप को डेहरी लांघने के लिये नेग देता था।

    फिर चढ़ाव का सिलसिला शुरू होकर विवाह तक शान्ति पूर्वक चलता रहता था, गाँव घर की महिलाएं मांगलिक गीतों की बौछार करती थीं। विवाह के बाद वर और कन्या कोहबर में जाते थे, कुछ समय तक हंसी मजाक चलता रहता था, फिर जामाजोरा उतारकर दूल्हे को खिचड़ी खाने के लिए बुलाया जाता था, दूल्हा के बाप , चाचा पहले से ही सहेजे रहते थे कि हम जब तक नहीं कहेंगे, खाना नहीं है, काफी मान मनौवल के बाद बिना कोई तगड़े आइटम के बिना दूल्हा खिचड़ी को हाथ नहीं लगाता था, घर की अन्य कई औरतों के द्वारा भी कुछ पैसे दिये जाते थे,फिर उसके बाद शुरू होता था सिलसिला,"आँचर धराई", जिसमें सोने की जंजीर या भैंस वगैरह का जुगाड़ बन जाता था, पंडितों के द्वारा शास्त्रार्थ भी होता था, बहुत ही आनंद आता था, फिर लड़की की विदाई के समय परिवारीजनों के अलावा ग्रामीण महिलाओं के द्वारा भी करुण क्रन्दन को सुनकर बारातियों की भी आँखें नम हो जाती थीं। ततपश्चात रुपया दो रुपया दे देकर हल्दी अक्षत लगाकर बारातियों की विदाई के समय भी कन्या पक्ष के लोगों की आंखों में आंसू भर आते थे, "भइया जी, मेरी बिटिया का ध्यान रखना किन्तु आज तो पूरा सिस्टम ही बदल गया है सब आधुनिक होता जा रहा है पहले सभी बारातियो का खान पान में ध्यान रखा जाता था किंतु अब बफर की ब्यवस्था है किसको कहना मिला कि नही मिला कोई पूछने बल नही है न तो कोई इस पर कोई सवाल ही उठता है क्योंकि सब आधुनिकता की चकाचौंध में सराबोर है अगर खुद न खस्ता किसी भी बारात में बफर नही रह तो लोग उसे पिछड़ा मानते है अब वह दिन कहाँ जब पत्तल में बैठ कर लोग कहना खिलाते थे उसका भाव ही कुछ अलग था लेकिन सब बदल गया है धीरे धीरे और भी ब्यवस्था आधुनिक होती जा रही है सिटी में बाजारों में महानगरों में अब बड़े बड़े फाइव स्टार होटल बुक किये जाते है जहाँ पर थाली के हिसाब से खाना मिलता है जिसमे 200 से 300 रुपये थाली का भोजन मिलता है अगर कोई बढ़ गया तो कहना अलग से मिलने में बड़ी परेशानी होती है कुल मिलाकर आधुनिकता की चक चौंध में सब कुछ बदल गया है।

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