सिंधिया अपमान झेल नही पाए ले लिया निर्णय अन्यथा हुआ तो यही अजय सिंह के साथ भी था,,,,,,,,,

 


 कांग्रेस सरकार बनने के बाद लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की प्रदेश में हार के तूफान में ज्योतिरादित्य सिंधिया की भी दुकान बंद हो गयी। 


सोने में सुहागा हो गया उनका महाराजांना तौर तरीका। लोकसभा की हार उनसे बर्दास्त नही हुई । वो सत्ता के केंद्र से बाहर नही रह सकते थे,क्योंकि राजनीतिक जन्म के साथ ही उन्हें  सांसद बनने का मौका जो मिला था,कमोबेश इसी स्थिति से अजय सिंह राहुल को भी गुजरना पड़ा। पन्द्रह वर्षों तक बीजेपी के खिलाफ संघर्ष करने वाले अजय सिंह ने नेता प्रतिपक्ष की हैसियत से भाजपा सरकार को हमेशा कटघरे में खड़ा रखा । कमलनाथ ,दिग्विजय की आमद तो आख़िरी आखिरी में हुई ।


असली लड़ाई तो सुरेश पचौरी,कांति लाल भूरिया ,अरुण यादव और अजय सिंह ने लड़ी ।फ़सल को बोने का काम इन्ही लोगों ने किया,लेकिन जब काटने का वक्त आया तो कोई और ही आ गया । यहां यह जरूर गौर करने वाली बात है कि इन लोगो मे सबसे बड़ा योगदान अजय सिंह का था,वह कैसे यह भी समझने की जरूरत है।


जब पचौरी अध्यक्ष बने तब उन्हें चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया गया,सूत्र तो यह भी बताते है कि उस समय अजय सिंह का पीसीसी अध्यक्ष बनना तय हो गया था,लेकिन उस समय ब्राह्मण समाज के तमाम नेता उत्तर प्रदेश में बसपा में जा रहे थे,उसे रोकने के लिए पचौरी को अध्यक्ष बनाया गया, कांग्रेस हाईकमान को यह गणित समझाने में मध्य प्रदेश के ही नेता थे जिनके इर्द गिर्द आज कांगेस घूम रही है,सही क्या है यह तो नही कहा जा सकता ।


खैर, पचौरी के बाद जब कांतिलाल भूरिया अध्यक्ष बने तब अजय सिंह को विधान सभा मे नेता प्रति पक्ष बनाया गया। 2013 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद अरुण यादव को अध्यक्ष बनाया गया,और सत्य देव कटारे नेता प्रतिपक्ष बने,जबकि कटारे भी चाहते थे कि अजय सिंह को ही नेता प्रतिपक्ष बनाया जाए,ऐसा एक बयान भी उन्होंने दिया था।लेकिन कुछ नेता ऐसा नही चाहते थे ।


कटारे  के असामयिक निधन के बाद फिर से विधायकों से राय शुमारी की गयी ,जिसमे अजय माकन पर्यवेक्षक बनकर आये थे, और अजय सिंह को  फिर से नेता प्रतिपक्ष बनाया गया । यानी लगातार पन्द्रह वर्षो तक  सीन में अजय सिंह ही रहे । लेकिन उनकी वरिष्ठता,उनकी सक्रियता,उनकी साफगोई  कुछ लोगों की हजम नही हो रही थी,इसलिए उन्हें स्क्रीन से बाहर करने का जो बीड़ा भाजपा ने उठाया था उसमें कुछ कांग्रेस के बड़े नेताओं ने भी चोरी,छुपे योगदान दिया,परिणाम स्वरूप अजय सिंह विधानसभा चुनाव हार गए,स्क्रीन से बाहर हो गए ।


अब चला गया उनकी उपेक्षा और अपमानित करने का दौर । पिछले चुनाव यानी वर्ष 2013 में कांग्रेस को संजीवनी देने वाले विंध्य को ,जहां से काफी कांग्रेस विधायक चुनाव जीतकर आये थे को नेपथ्य में डाल दिया गया। सिर्फ अजय सिंह को कमजोर करने के लिए पन्द्रह महीनों की कांग्रेस सरकार में लगातार उनको नजरअंदाज किया गया,उन्ही के पूर्व चेले को कैबिनेट मंत्री भर नही बनाया गया,बल्कि वही विभाग दिया गया जो कभी अजय सिंह के पास हुआ करता था,विंध्य में ही जबकि पांच बार के विधायक बिसाहू लाल मौजूद थे।


और आदिवासी समाज से आते थे।यही नही जगह, जगह बार ,बार उन्हें इस बात का एहसास कराया गया कि अब आपका कोई वजूद नही है,यही फर्क कांग्रेस और भाजपा में है,उदाहरण के लिए रामपाल सिंह के लगातार चुनाव हारने के बाद भाजपा सरकार में उनकी अहमियत को बरकरार रखा गया था ,और भाजपा ने उनका उपयोग कर पार्टी को मजबूत किया।


ऐसा कांग्रेस भी कर सकती थी,लेकिन पन्द्रह वर्षों के लंबे अंतराल के बाद कांग्रेस की सरकार बनी थी, पार्टी के माई बाप मन्त्र मुग्ध थे। विंध्य क्षेत्र के फैसलों में अजय सिंह की कोई पूछ परख नही थी,इनसे ज्यादा तो तवज्जो रीवा के शहर कांग्रेस अध्यक्ष मंगू सरदार की थी,जबकि जिले में सिख समाज के लोगों की संख्या उंगलियों में गिनी जा सकती है ।


गौर करने वाली बात यह है कि सिंधिया को इस सरकार में ग्वालियर चम्बल और मालवा के अधिकतर फैसलों में अहमियत दी गयी। राजनीतिक पारखी कहते है कि अजय सिंह में उपेक्षा सहने की ,अनदेखी बर्दास्त करने की क्षमता थी,धैर्य था,इसलिए सब झेल गए ,लेकिन सिंधिया महाराज थे इसलिए नही झेल पाए । सिंधिया ने खुद के वजूद के लिए कांग्रेस छोड़ी,लेकिन अजय सिंह ने समय  के तकाजे को समझा, और वक्त के इंतजार में खुद को अलग करते हुए धैर्य रखा।


ऐसा नही कि जो सिंधिया ने किया वैसा वह नही कर सकते थे,बिल्कुल कर सकते थे,वक्त, बेवक्त शायद उन्हें ऐसे सुझाव भी मिले हों,लेकिन शायद उन्हें विरासत में मिली कांग्रेस की विचारधारा ज्यादा रास आयी,इसलिए वह अपमानित,उपेक्षित होते रहे,और वह एक कार्यकर्ता के रूप में जरूरत मन्द ,निराश काँग्रेसजन, और आमजन का मनोबल बढ़ाते रहे,भोपाल स्थित उनके शासकीय आवास में लगने वाली भीड़ कम से कम यही बयां करती थी।।    


  बदलते सन्दर्भ में यदि निष्पक्ष भाव से देखा जाए तो कांग्रेस नेतृत्व को अब काट छांट की राजनीति से तौबा कर लेनी चाहिये।


कांग्रेसजन भी चाहता है कि कुछ नए हालात बने,नए समीकरण बने,नई जिम्मेदारी बने । कमलनाथ जी सर्वमान्य नेता है ,जिस दिन सरकार से इस्तीफा दिया था उसी दिन अजय सिंह को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बना देना चाहिए था,हालांकि कहने वाले तो यह भी कहते है कि यदि पीसीसी का अध्यक्ष छह माह पहले नियुक्त हो जाता तो सरकार बच जाती ।


अब तो प्रदेश कांग्रेस में गुटबाजी खत्म हो गयी है एक ही ग्रुप बचा है,कमलनाथ दिग्विजय सिंह ।
 यह दोनों अपने सोच के दायरे से कितना बाहर निकल पाते है, कांग्रेस का भविष्य, और उपचुनावों के परिणाम काफी कुछ इस बात पर निर्भर करते है,कम से कम सोनिया गांधी और कमलनाथ से तो लोग यही उम्मीद करते है,देखिए आगे आगे होता है क्या है ?


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